फ़ैसला तुम को भूल जाने का
इक नया ख्वाब है दीवाने का
दिल कली का लरज़ लरज़ उठा
जिक्र था फिर बहार आने का
हौसला कम किसी में होता है
जीत कर खुद ही हार जाने का
जिंदगी कट गई मनाते हुए
अब इरादा है रूठ जाने का
आप शहज़ाद की ना फिक्र करें
वो तो आदी है ज़ख़्म खाने का
No comments:
Post a Comment